1st of all donot panic,
read the complaint application many times, then only reply in accepting true facts or dening false stements,
there is no need to provide full evidencial support and all of your proofs at his stage for showing your innocence,
Doing so you will only help her,

No need to reveal your cards and provide her information about your counters,
you can use 10 to 20 percent of such information to provide the court with idea that “this is a false case and that the wife has approached the court with unclean hands .”
Use a accepted or denied format while replying to her alligations, proof etc will be much later.
Sample
न्यायालय महानगर मजिस्ट्रेट, क्रम संख्या – ____, जयपुर महानगर, जयपुर
प्रकरण संख्या – ____ / 20____
Wife(परिवादिया) बनाम Husband(प्रत्यर्थी संख्या 1)
प्रत्यर्थी संख्या 1 की और से जवाब प्रार्थना पत्र निम्न प्रस्तुत है ।महोदय,
जवाब प्रार्थना पत्र निम्न प्रकार है –
जवाब सम्बंधित तथ्य एवम घरेलु हिंसा की घटनाये :-
यह की मद संख्या 1 जहाँ तक परिवादिया का नाम पता दर्ज है स्वीकार है । यह कहना ग़लत है की परिवादिया व्यथित पक्षकार है
यह की मद संख्या 2 स्वीकार है ।
यह की मद संख्या 3(ए) स्वीकार है । परिवादिया शादी के वक़्त अपने पिता के साथ किराए के मकान में xxxx में रहती थी । बाद में परिवादिया अपने पिता के साथ xxxxxxxxxxx शिफ़्ट होकर वर्तमान में रह रही है ।
यह की मद संख्या 3(बी) गलत होने से अस्वीकार है । यह कहना गलत है की प्रत्यर्थी संख्या 1 की मांग के अनुसार दायजा अमानत सोपा था जिसमे सोना एवम चांदी के जेवरात व कपडे आदि भी थे । यह कहना गलत है की प्रार्थिया संख्या 1 का स्त्रीधन आज भी प्रत्यर्थीगण के कब्ज़े में है । यह कहना गलत है की प्रार्थिया संख्या 1 की मांग किये जाने के बावजूद प्रत्यर्थी संख्या 1 ने उसे देने से इनकार कर दिया है । वास्तविक तथ्य यह है की विवाह में ना तो दहेज़ की कोई मांग की गई ना ही किसी भी प्रकार का दहेज़ का आदान प्रदान हुआ । विवाह में कुछ ख़ास ज़ेवरात परिवादिया को मिले ही नहीं थे । परिवादिया का पिता ग़रीब व्यक्ति है बमुश्किल इनके परिवार का ख़र्च चलता था । परिवादिया के पिता के 4 बच्चे है परिवादिया की माता ग्रहिणि है । कोई बेशक़ीमती ज़ेवर थे ही नहीं । परिवादिया को वकालत करते हुए मात्र 2 वर्ष ही हुए थे और उसकी कोई ख़ासी आय उस समय नहीं थी । जो छोटा मोटा समान था वो परिवादिया ने हमेशा ही अपने कब्ज़े में रखा व आज भी उसी के कब्ज़े में है ।
यह की मद संख्या 3(सी) स्वीकार है ।
यह की मद संख्या 3(डी) गलत होने से अस्वीकार है । यह कहना गलत है की प्रत्यर्थी संख्या 2 ने गहने उतारने को कहा व अमानत स्वरूप रख लिया । यह कहना गलत है की शादी के 10 दिन पुर्व प्रार्थि संख्या 1 के माता पिता ने 5,00,000/- रुपये समान के लिए दिये व शादी वाले दिन प्रार्थि संख्या 1 व प्रत्यर्थी संख्या 1 के नाम से संयुक्त एफ.डी.आर. के लिए 15,00,000/- रुपये प्रत्यर्थीगण को दिये । यहां यह उल्लेखनीय है कि परिवाद में संलग्न समान व स्त्रीधन की सूची सम्पुर्तः गलत व झूठी है । जैसा की ऊपर उल्लेखित किया गया है कि विभाग के वक्त किसी प्रकार के दहेज नकदी जेवर आदि का आदान-प्रदान ही नहीं हुआ था । परिवार प्रत्यय की संख्या एक के पास था ही नहीं । परिवादिया ने 498a की एफ आई आर प्रत्यर्थी संख्या एक के विरुद्ध दर्ज करवायी थी उसमें भी पुलिस द्वारा मात्र एक छोटा टीवी, एक सिलाई की मशीन, दो गैस सिलेंडर व एक अंग्रेज़ी चूल्हा बरामद किया था ।
यह की मद संख्या 3(ई) गलत होने से अस्वीकार है । यह कहना गलत है की प्रत्यर्थीगण का व्यवहार प्रार्थी संख्या 1 के प्रति बेहद क्रूरता पूर्ण रहा । यह कहना गलत है की प्रत्यर्थी संख्या 1 के किसी भी परिवारजन ने 18/11/2010 को प्रार्थी संख्या 1 के कमरे में घुस कर 21 लाख रुपये लाने को कहा व हौंडा सिटी गाड़ी की मांग करी । यह कहना गलत हैै की प्रार्थी संख्या 1 ने यह बात उसी रात प्रत्यर्थी संख्या 1 को बताई व प्रत्यर्थी संख्या 1 ने प्रार्थी को कहा की अगर इस घर में रहना है तो यह मांग पूरी करनी होगी । यह कहना गलत है की प्रत्यर्थी संख्या 1 के किसी भी परिवारजन ने प्रार्थी संख्या 1 के साथ कोई भी अश्लील हरकत करी हो या प्रार्थी संख्या 1 ने इस बारे में प्रत्यर्थी संख्या 1 को बताया हो । यह कहना गलत है की प्रत्यर्थीगण द्वारा शारीरिक व मानसिक यातनाये दी । यहां यह भी उल्लेखनीय है की माननीय उच्च न्यायालय, राजस्थान ने भी प्रकरण संख्या 109/2019 अंतर्गत धारा 482 द.प्र.स. के निर्णय मैं श्री xxxxx (प्रत्यर्थी संख्या 3), श्रीमती xxxxxxxxx xxxग्गी (प्रत्यर्थी संख्या 4) को किसी भी प्रकार की घरेलू हिंसा व कथित प्रकरण से दोषमुक्त किया है।
यह की मद संख्या 3(एफ) गलत होने से अस्वीकार है । यह कहना गलत हे की प्रत्यर्थीगण क्रूर व्यवहार के निर्दयी, दहेज़ के लोभी संकीर्ण मानसिकता वाले लालची किस्म के लड़ाई-झगड़ा करने वाले व्यक्ति है । यह कहना गलत है की प्रत्यर्थीगण आए दिन प्रार्थी संख्या 1 को हैरान व परेशान करते थे व दहेज़ को लेकर मानसिक व शारीरिक प्रताड़ना करते थे । यह कहना गलत है की प्रार्थी संख्या 1 भारतीय संस्कृति की एक संस्कारवान नारी हैै । यह कहना गलत है की प्रार्थी संख्या 1 समझदारी का परिचय देने में सक्षम है या कुछ भी सहन करने या सब्र रखने की क्षमता रखती है । यह कहना गलत है की प्रत्यर्थीगण ने छोटी छोटी बातों को लेकर क्लेश, अभद्र व्यवहार व गाली गलोच प्रार्थी संख्या 1 के साथ करना जारी रखा । वास्तविक तथ्य यह है की जब प्रार्थी संख्या 1 व प्रत्यर्थी संख्या 1 अपने होनेमून पे मसूरी, उत्तराखंड में थे तभी पहली रात से ही प्रार्थी संख्या 1 ने प्रत्यर्थी संख्या 1 पे यह दबाव बनाना शुरू कर दिया की प्रत्यर्थी संख्या 1 अपने माता पिता का घर छोड़ कर प्रार्थी के साथ जयपुर चल कर वही बस जाए क्योंकि वह जयपुर रह कर RJS की तैयारी करना चाहती थी व वही पर रह कर वकालत भी करना चाहती थी । जब प्रत्यर्थी संख्या 1 ने प्रार्थी संख्या 1 को समझाने की कोशिश करी की प्रत्यर्थी संख्या 1 की माता एक वृद्ध महिला है व वह देहरादून ही रहना चाहता है तो इसपे प्रत्यर्थी संख्या 1 को अपने साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाने से भी मना कर दिया । इस तरह से प्रार्थी संख्या 1 ने हनीमून की प्रथम रात्रि से ही प्रार्थी संख्या 1 को वैवाहिक सुखों से वंचित कर उस पर दबाव बनाना शुरू कर दिया कि वह परिवार से अलग होकर व अपने परिवार से अपना हिस्सा माँगकर प्रार्थी संख्या 1 के साथ जयपुर आ कर बस जाये तथा चाहे तो घर जवाई भी बन सकता है। इस बात को प्रार्थी (husband) ने नही माना तथा( wife) को बहुत समझाने की कोशिश की परंतु प्रार्थी संख्या 1 आये दिन उस पर दबाव बनाने लगी व इस बात को लेकर तनावपूर्ण माहौल घर में बनाये रखा ।
यह की मद संख्या 3(जी) गलत होने से अस्वीकार है । यह कहना ग़लत है की प्रत्यर्थी ने परिवादिया को किसी भी प्रकार का मानसिक शारिरीकम कष्ट दिया हो।
यह की मद संख्या 3(एच) इस हद तक स्वीकार है की दिसम्बर 2010 में प्रार्थि संख्या 1 के माता पिता प्रत्यर्थीगण के घर आये व प्रार्थी संख्या 1 अपने माता पिता के मूल निवास स्थान सुजानगढ़ गयी । यह कहना गलत है की प्रत्यर्थी संख्या 1 लगायत 3 ने प्रार्थी संख्या 1 के माता पिता के साथ अभद्र व्यवहार व गाली गुफ्तारी करी । यह कहना गलत है की प्रत्यर्थी संख्या 1 लगायत 3 ने यह ताना मारा हो की विवाह में हौंडा सिटी कार व 21 लाख रुपये नकद नहीं दिये । यह कहना गलत है की प्रत्यर्थी संख्या 1 लगायत 3 आग-बबूला हो गये व यह कहना गलत है की प्रत्यर्थी संख्या 1 लगायत 3 ने यह कहा की अगर उनकी मांग पूरी नहीं करी तो वह प्रार्थी संख्या 1 को जान से ख़त्म कर देंगे । यह कहना गलत है की प्रार्थी संख्या 1 के माता पिता ने अपने आर्थिक स्थिति का कोई हवाला दिया । परिवादिया के माता पिता की आर्थिक स्थिति कमज़ोर थी यह बात भी परिवादिया स्वीकार करती है । परिवादिया के माता पिता द्वारा विवाह में इस परिवाद में उल्लेखित राशी ख़र्च ही नहीं करी । प्रत्यर्थी को भी इस तथ्य का ज्ञान प्रारम्भ से था । ऐसी परिस्थितियों में परिवादिया से किसी भी प्रकार की माँग करने बाबत कथन ही अप्राकृतिक है ।
यह की मद संख्या 3(आई) गलत होने से अस्वीकार है । यह कहना गलत है की प्रत्यर्थी संख्या 1 सुजानगढ़ में प्रार्थी संख्या 1 के माता पिता के स्थायी निवास पे आया व उसने दहेज़ की मांग रखी । यह कहना गलत है की प्रत्यर्थी संख्या 1 के साथ कोई समझाइश की गयी हो या उसने कोई मार पीट की हो । यह कहना गलत है की प्रत्यर्थी संख्या 1 प्रार्थी संख्या 1 को सुजानगढ़ छोड़ कर अपने निवास स्थान देहरादून चला गया हो । यह कहना गलत है की मोबाइल वार्ता में प्रार्थिया के माता पिता ने प्रत्यर्थीगण से समझाइश की हो । यहां यह उल्लेखनीय है की प्रत्यर्थी संख्या 1, 26 दिसम्बर 2010 को सुजानगढ़ पहुँच गया था व तब से लेकर 17/01/2011 तक प्रार्थी संख्या 1 व उसके माता पिता की गुज़ारिश पे सुजानगढ़ में ही रुका रहा । इस दौरान ना तो वह देहरादून वापिस गया ना ही वापिस आया व प्रार्थी ने संपूर्णतः बेबुनियाद आरोप लगाये है । यहां यह उल्लेखनीय है की प्रत्यर्थी इस अवधि में नया बॉस मंदिर रोड स्थित जसूजा परिवार के घर में ही रुका हुआ था व प्रार्थी संख्या 1 की सगी बहन विकल्प जिसका जन्म दिन 1 जनवरी को पड़ता है वह मनाने के लिए सुजानगढ़ ही रुका ।
यह की मद संख्या 3(जे) इस हद तक स्वीकार है की जून 2011 में प्रार्थी संख्या 1 को ले प्रत्यर्थी संख्या 1 कलकत्ता आ गया था बाकि सभी कथन गलत होने से अस्वीकार है । यह कहना गलत है की प्रत्यर्थी संख्या 1 अपने फ़ोन पर अन्य महिलाओ के साथ चैटिंग करता था तथा प्रार्थी संख्या 1 के साथ अभद्र व्यवहार करता था । यह कहना गलत है की प्रत्यर्थी संख्या 1 ने यह कहाँ हो की तू तो मेरी पेर की जूती के समान है, मैं तुझे पसंद नहीं करता । यह कहना गलत है की प्रत्यर्थी संख्या 1 ने यह कहा हो की वह अपना धर्म परिवर्तन करके और कई शादियाँ करेगा व तू मेरे लायक ही नहीं है । यह कहना गलत है की प्रार्थी संख्या 1 ने किसी भी बात की कोई भी समझाइश की हो । यह कहना गलत है की प्रत्यर्थी संख्या 1 ने गाली गलोच करी हो व यह कहना गलत है की मार-पीट करी व प्रार्थी संख्या 1 को शारीरिक व मानसिक प्रताड़ना दी । यहाँ यह उल्लेखनीय है की प्रार्थी संख्या 1 कलकत्ता पहुंच कर हसी-ख़ुशी रही व उनके बीच कोई लड़ाई झगड़ा नहीं हुआ व प्रार्थी संख्या 1 द्वारा लिखे गये कथन काल्पनिक है ।
यह की मद संख्या 3(के) इस हद तक स्वीकार है की सितम्बर 2011 में प्रार्थी संख्या 1 के गर्भवती होने के बारे में पता चला था बाकी सभी कथन गलत होने की वजह से अस्वीकार है । यह कहना गलत है की प्रत्यर्थी संख्या 1 ने गला दबा के जान से मारने की कोशिश करी । यह कहना गलत है की प्रत्यर्थी संख्या 1 ने प्रार्थी संख्या 1 पे गर्भपात करवाने का दबाव डाला व यह कहा हो की जब तक दहेज़ की मांग पूरी नहीं होगी तब तक कोई बच्चा नहीं होगा । प्रत्यर्थी ने परिवादिया का उसकी गर्भावस्था में पूर्ण देख रेख करी और ख्याल रखा था ।
यह की मद संख्या 3(एल) गलत होने से अस्वीकार है । यह कहना गलत है की कोई घटना कि खबर प्रार्थी संख्या 1 ने अपने पिताजी को दी हो । कोई घटना हुई ही नहीं थी । यह कहना गलत है की सितम्बर 2011 में प्रार्थी संख्या 1 के पिताजी ने कलकत्ता आने के बाद प्रत्यर्थी संख्या 1 के हाथ जोड़कर समझाया ।
यह की मद संख्या 3(एम) इस हद तक स्वीकार है की प्रार्थी संख्या 2 का जन्म 09/05/2012 को हुआ बाकी सभी कथन गलत होने से अस्वीकार है । यह कहना गलत है की प्रार्थी संख्या 1 की गोद भराई 11 फरवरी 2012 में हुई व यह कहना गलत है की गोद भारी की रसम में प्रत्यर्थीगण ने दहेज़ की मांग की । यह कहना गलत है की एक गले का हार वजनी 4 तोला तथा समस्त प्रत्यर्थीगण व अन्य रिश्तेदारों के लिए कपड़े, मिठाई इत्यादि दिये । यह कहना गलत है की प्रार्थी संख्या 2 के जन्म के बाद प्रत्यर्थीगण ने दहेज़ की मांग करी व जब तक दहेज़ की मांग पूरी नहीं होगी तब तक प्रार्थी संख्या 1 के माता पिता को प्रार्थी संख्या 2 का मुख तक नहीं देखने देंगे ।
यह की मद संख्या 3(एन) इस हद तक स्वीकार है की अक्टूबर 2013 में प्रत्यर्थी संख्या 1 को अपने कार्यस्थल पे चला गया था बाकि सभी कथन गलत होने से अस्वीकार है । यह कहना गलत है की प्रत्यर्थी संख्या 1 ने काम पे जाने के बाद प्रार्थीगण की कोई खेर खबर नहीं ली । यह कहना गलत है की जीवन यापन व भरण पोषण के लिए प्रत्यर्थी संख्या 1 ने प्रार्थीगण को आवश्यक समान उपलब्ध नहीं कराया । यह कहना गलत है की प्रत्यर्थी संख्या 2 लगायत 5 ने प्रार्थीगण को गंभीर रूप से मानसिक व शारीरिक प्रताड़ना दी । यह कहना गलत है की प्रार्थी संख्या 1 ने इस बात की खबर अपने पिताजी को दी व इसी कारण प्रार्थी संख्या 1 के पिताजी उसे अपने हाल निवास जयपुर लेकर चले गये । यह कहना गलत है की मई 2014 में शराब पीकर प्रत्यर्थी संख्या 1 के घर गया व प्रार्थी संख्या 1 से अभद्र व्यवहार किया व ऐसी परिस्थितियों में प्रार्थीगन में देहरादून वापिस आए । यही नहीं तनखा मिलने में देर होने की वजह से दोस्तों से उधर लेके भी पैसे प्रार्थी संख्या 1 को भेजता था ताकि वह सहजता से जीवन व्यतीत कर पाए । प्रार्थी संख्या 1 पे ससुराल में प्रत्यर्थीगण की तरफ से कोई रोक टोक नहीं थी व वह जब मन चाहे अपने मायके जाने के लिए स्वछंद थी इसीलिए जब भी प्रत्यर्थी संख्या 1 अपने कार्य के लिए देहरादून से बाहर जाता था तो प्रार्थी संख्या 1 स्वतः ही अपने मायके चली जाति थी क्योंकि उसको ससुराल पक्ष के साथ रहना गवारा नहीं था । प्रत्यर्थी संख्या 1 ने काफ़ी धनराशी परिवादिया को दी है ।
यह की मद संख्या 3(ओ) इस हद तक स्वीकार है की जनवरी 2015 में प्रत्यर्थी संख्या 2 व 4 जयपुर आए बाकि सभी कथन गलत होने से अस्वीकार है । यह कहना गलत है की जयपुर आने के अगले दिन ही प्रत्यर्थी संख्या 2 व 4 ने व्यवस्था व लेन-देन को लेकर अभद्र व्यव्हार किया । यह कहना गलत है की प्रत्यर्थी संख्या 2 व 4 ने ऐसा कहा हो की दहेज़ ना मिलने से समाज में नाक कट गयी हो व वह इस कारण प्रार्थीगण को जयपुर में छोड़ के देहरादून वापिस चले गये हो । वास्तविक तथ्य यह है की प्रत्यर्थी संख्या 2 व 4 जयपुर प्रार्थीगण से मिलने आये थे व इस दौरान कोई भी अप्रिय घटना घटित नहीं हुई व प्रार्थी संख्या 1 ने कुछ समय और जयपुर में रुकने का निवेदन किया इसलिए प्रत्यर्थी संख्या 2 व 4 अकेले देहरादून चले गये ।
यह की मद संख्या 3(पी) गलत होने से अस्वीकार है । यह कहना गलत है की 10/08/2015 को प्रत्यर्थीगण ने प्रार्थी संख्या 1 के साथ मारपीट की व दहेज़ की मांग की व खुद को बहुत प्रभावशाली होना बताया व पुलिस के उच्च अधिकारियों व मंत्रियों से साठगांठ होना बताया हो । यह कहना गलत है की प्रार्थी संख्या 1 ने इस बारे में अपने पिता को फ़ोन पे बताया हो व उसके पिताजी ने अपना पेट काट कर के जमा करी हुई राशी में से किश्तों के द्वारा 3,00,000/- रुपये नगद प्रत्यर्थी संख्या 2 को दिया । प्रत्यर्थी ने कोई राशी प्राप्त नहीं करी । यह कहना गलत है की प्रत्यर्थीगण ने दहेज की मांग जारी रखी व 16/03/2016 को प्रत्यर्थी संख्या 1 व 3 एवम प्रार्थी संख्या 1 की जेठानी प्रत्यर्थी संख्या 5 ने 2,00,000/- रुपये और लाने को कहा व लात-घूसों से मारपीट करी जिस से छोटे आयी । यह कहना गलत है की प्रार्थी संख्या 1 का कोई वैध मेडिकल मुआयना हुआ व यह कहा हो की तू तो भूके नंगे परिवार से है इत्यादि । यहां यह उल्लेखनीय है की प्रार्थी संख्या 1 द्वारा दायर प्र.सु.रि. Xxx/2017 में हुबहू ऐसे ही कथन करे है जिन्हें अनुसंधान उपरान्त पुलिस ने झूठा माना है जो की रिपोर्ट के मद संख्या 8 में निम्नानुसार है – “8. दिनांक 10.08.2015 को परिवादिया के ससुराल वालों द्वारा एक राय होकर परिवादिया के साथ मारपीट करने, दहेज की मांग करने, परिवादिया के पिता द्वारा इसकी सास को 3 लाख रुपये नकद देने के आरोप अनुसंधान में प्रमाणित नही पाये गये।”। यह की पुलिस ने अपनी रिपोर्ट के मद संख्या 9 में आगे कथन किये है की “… परिवादिया की सास वीना बम्मी, झेठ xxxx, जेठानी xxx द्वारा दो लाख रुपये और लाने की बात को लेकर झगड़ा करने, लात-घूंसों से मारपीट करने के आरोप अनुसंधान में प्रमाणित नही पाये गए है।” । प्रार्थी संख्या 1 ने झूठे कथन कर perjury कारित की है व मात्र माननीय न्यायालय को गुमराह करने की नियत से की है ।
यह की मद संख्या 3(क्यू) गलत होने से अस्वीकार है । यह कहना गलत है की किसी घटना के पश्चात् प्रार्थी संख्या 1 अपने पुत्र प्रार्थी संख्या 2 को लेकर जयपुर चली गयी । यह कहना गलत है की प्रत्यर्थी संख्या 1 निरंतर रूप से फ़ोन पर धमकी देता रहा तथा माह सितम्बर, नवम्बर, दिसम्बर 2016 में तथा दिनांक 11 जनवरी 2017 को प्रत्यर्थी संख्या 1 जयपुर स्थित प्रार्थीगण के हाल निवास पे शराब पी कर आया और अभद्र व्यवहार किया व दहेज़ की मांग की । यह कहना गलत है की प्रत्यर्थी संख्या 1 ने यह कहा की मैंने तुझसे शादी ही इसीलिए करी है क्यूंकि तुझे घर की नौकरानी बना रखूँगा व हाथ मरोड़कर मार पीट की । यह कहना गलत है की प्रार्थी संख्या 1 ने स्त्रीधन की मांग की व प्रत्यर्थी संख्या 1 ने लोटाने से मन कर दिया । यह कहना गलत है की प्रत्यर्थी संख्या 2 से फ़ोन पे बात हुई हो और स्त्रीधन लोटाने से इंकार करा । यहां यह उल्लेखनीय है की प्रार्थी संख्या 1 द्वारा दायर प्र.सु.रि. Xxx/2017 में हुबहू ऐसे ही कथन करे है जिन्हें अनुसंधान उपरान्त पुलिस ने झूठा माना है जो की रिपोर्ट के मद संख्या 11 में निम्नानुसार है – “11- दिनांक 11/01/2017 को परीवादिया का पति जयपुर स्थित अपने ससुराल आया और परिवार दिया के साथ दहेज की मांग करते हुए झगड़ा किया परिवादिया ने अपना स्त्री धन मांगा तो देने से मना कर दिया उक्त आरोप अनुसंधान से प्रमाणित नहीं पाए गए आरोपी xxx के मोबाइल की प्राप्त कॉल डिटेल का अवलोकन करने पर इस दिन उसका टावर लोकेशन उत्तर प्रदेश होना पाया गया” । यहां यह भी उल्लेखनीय है की प्रार्थी संख्या 1 RJS की तैयारी करने हेतु जयपुर खुद आयी थी व जयपुर रहते हुए उसने लगभग 4,10,000/- रुपये प्रत्यर्थी संख्या 1 के संयुक्त खाते से निकाल कर अकाउंट का बैलेंस कई बार शून्य कर दिया । यहां यह भी उल्लेखनीय है की इस दौरान प्रार्थीगण देहरादून भी आये व प्रत्यर्थीगण के ही घर पर रुक कर आराम से समय व्यतीत किया । इसी दौरान जब भी प्रत्यर्थी संख्या 1 को अपने काम से समय मिलता तो वह प्रार्थिगण से मिलने जयपुर भी आता व उन्हें घूमने फिरने ले जाता ।
यह की मद संख्या 3(आर) गलत होने से अस्वीकार है । यह कहना गलत है की 16/06/2017 को प्रत्यर्थी संख्या 1 व 2 ने प्रार्थी संख्या 1 को फ़ोन कर ससुराल आने को कहा व यह कहना गलत है की प्रार्थी संख्या 1 किसी आश्वासन दिलाने के कारण 19/06/2017 को प्रत्यर्थी संख्या 1 के पास ग्रेटर नॉएडा चली गयी । यह कहना गलत है की प्रत्यर्थी संख्या 1 ने वहा फिर दहेज़ की मांग करी हो व प्रार्थीगण को अपनी माँ के घर देहरादून छोड़ आया । यह कहना गलत है की प्रत्यर्थी संख्या 3 ने प्रार्थी संख्या 1 को गन्दी नज़र से देखा हो या अश्लील ताने और फब्तिया कसता रहा । वास्तविक तथ्य यह की इस दौरान प्रार्थीगण से मिलने कई बार जयपुर भी आया व प्रार्थीगण भी कई बार प्रत्यर्थीगण से मिलने देहरादून व नॉएडा भी आये गये और इस दौरान कोई भी अप्रिय घटना पक्षकारान के मध्य घटित नहीं हुई । यहां यह भी उल्लेखनीय है की माननीय उच्च न्यायालय, राजस्थान ने भी प्रत्यर्थी संख्या 3 लगायत 5 को दोषमुक्त कर दिया है व पुलिस ने भी अपनी रिपोर्ट में प्रत्यर्थी संख्या 3 पे लगाए गये इलज़ाम को बेबुनियाद पाया । प्रार्थी संख्या 1 ने झूठे कथन कर perjury कारित की है व मात्र माननीय न्यायालय को गुमराह करने की नियत से की है ।
यह की मद संख्या 3(एस) गलत होने से अस्वीकार है । यह कहना गलत है की 17/10/2017 में प्रत्यर्थी संख्या 3 व 4 ने घरेलु कार्य को लेकर गाली-गलोच किया तथा प्रार्थी संख्या 2 के साथ भी मार पीट की । यह कहना गलत है की एलानिया धमकी दी की अगर दहेज़ की मांग पूरी नहीं करी तो तुझे तेरे पति से हमेशा के लिए अलग करवा देंगे और जीवन भर तुम्हे अपने पीहर में ही रहना पड़ेगा व दर दर भटकना पड़ेगा नहीं तो हमारी मांग पूरी करवा दो । यह कहना गलत है की प्रत्यर्थी संख्या 1 व 2 दिनांक 18/10/2017 को देहरादून आकर उन्होंने प्रत्यर्थी संख्या 3 व 4 को सही ठहराया व दिनांक 22/10/2017 को प्रत्यर्थी संख्या 3 व 4 ने दहेज़ की मांग कर मार पीट करी जिसकी सूचना प्रार्थी संख्या 1 ने फ़ोन से अपने पिताजी को दी । यह कहना गलत है की 01/11/2017 को जब प्रार्थिया के माता पिता प्रत्यर्थीगण के घर देहरादून पहुचे तो प्रत्यर्थी संख्या 2 ने प्रार्थी संख्या 1 के माता पिता के साथ अभद्र व्यवहार कर दहेज़ की मांग करी । यहां यह उल्लेखनीय है की माननीय उच्च न्यायालय, राजस्थान ने आदेश दिनांकित 03/08/2018 में प्रत्यर्थी संख्या 3 लगायत 5 के विरूद्ध लगाये गये आरोपों को झूठा मानते हुए प्रा.सु.री. 264/2017 में से तीनो के नाम हटाने के आदेश पारित किये है ।
यह की मद संख्या 3(टी) गलत होने से अस्वीकार है । यह कहना गलत है की 01/11/2017 को प्रत्यर्थीगण ने प्रार्थी संख्या 1 के साथ मार पीट कर पहने हुए कपड़ो मैं ही घर से निकाल दिया । यह कहना गलत है की प्रत्यर्थीगण बेहद लालची, क्रूर तथा इंसानियत के नाम पर कलंक है, जिन्होंने लगातार प्रार्थिया को दहेज़ बाबत मांग व धमकी दी तथा प्रताड़ित किया तथा गंभीर रूप से मानसिक व शारीरिक व आर्थिक रूप से प्रताड़ित किया । परिवादिया ने जिस प्रकार के derogatory अभिकथन प्रत्यर्थीगण के ख़िलाफ़ इस परिवाद में अंकित किए है उसके विरुद्ध कार्यावही करने के अपने विधिक अधिकार को प्रत्यर्थीगण सुरक्षित रखते है । वास्तविक तथ्य यह है की प्रार्थी संख्या 1 द्वारा लगाये गये सभी आरोप काल्पनिक व मनघडंत है जिनमे लेश मात्र की सच्चाई नहीं है । यहां यह भी उल्लेखनीय है की प्रार्थी संख्या 1 को अपनी वकालत की डिग्री का बहुत अभिमान है व अपनी कानूनी ज्ञान का सम्पुर्तः दुरुपयोग कर प्रत्यर्थीगण को हर तरीके से हैरान व परेशान कर रही है ।
यह की मद संख्या 3(यू) गलत होने से अस्वीकार है । यह कहना गलत है की 07/11/2017 को प्रत्यर्थी संख्या 1 प्रार्थी संख्या 1 के यहां शराब पी के आया व दहेज़ की मांग करी व उसके माता पिता के साथ अभद्र व्यवहार किया एवम प्रार्थी संख्या 1 द्वारा स्त्रीधन की मांग करने पर स्त्रीधन लोटने से मना कर दिया । यहां यह उल्लेखनीय है की प्रा.सू.री. संख्या 264/2017 में अपनी रिपोर्ट में अनुसंधान अधिकारी द्वारा दी गई रिपोर्ट में भी यह बात स्पष्ट रूप से निकल कर आई है कि प्रत्यर्थी गौरव बताई गई उक्त तारीख को नोएडा में था तथा जयपुर गया गया ही नहीं ।
यह की मद संख्या 3(वी) गलत होने से अस्वीकार है ।
यह की मद संख्या 3(डब्लू) गलत होने से अस्वीकार है । यह कहना गलत है की प्रत्यर्थी संख्या 1 एन.आर.आई. है व प्रकरण की जानकारी होने पर विदेश भागने की फिराक में है ।
यह की मद संख्या 3(एक्स) गलत होने से अस्वीकार है । यह कहना गलत है की प्रत्यर्थीगण के प्रभाव के कारण देहरादून में लगाई गयी शिकायत पर कोई कार्यवाही नहीं हुई । यह कहना गलत है की प्र.सु.री. संख्या xxx/2017 वर्तमान में पुलिस थाने बनी पार्क में अनुसंधान हेतु लंबित है ।
यह की मद संख्या 3(वाई) गलत होने से अस्वीकार है । यह कहना गलत है की प्रार्थी संख्या 1 अध्ययनरत है तथा प्रार्थी संख्या 1 के पास आय का कोई जरिया नहीं है । यह कहना गलत है की प्रार्थी संख्या 1 पुर्णतः अपने पिता पे आश्रित है व उसके पिता की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है । यह कहना गलत है की प्रार्थी संख्या 1 RJS की तैयारी कर रही है व कोचिंग क्लासेज भी ज्वाइन कर रही है जिसका खर्चा 35,000/- रुपये मासिक है । यह कहना गलत है की प्रार्थीगण के भरण पोषण इत्यादि के लये लगभग 90,000/- रुपये प्रति माह खर्च होता है । यह कहना गलत है की प्रत्यर्थी संख्या 1 मर्चेंट नेवी में थर्ड ऑफिसर के पद पर कार्यरत है । यह कहना गलत है की प्रत्यर्थी संख्या 1 लगभग 5,00,000/- रुपये से अधिक महावार वेतन अर्जित कर रहा है । यह कहना गलत है की प्रत्यर्थीगण के मकान की कीमत 10-10 करोड़ है जिसमे प्रत्यर्थी संख्या 1 का हिस्सा है । यह कहना गलत है की प्रत्यर्थी संख्या 1 के पास में एक प्लाट देहरादून में स्तिथ है । यह कहना गलत है की प्रत्यर्थीगण के माकन में 6 किरायेदार निवास कर रहे है व लगभग 60,000/- रुपये किराया मासिक आता है जिसमे प्रत्यर्थी संख्या 1 का भी हिस्सा है । यह कहना गलत है की प्रत्यर्थी संख्या 1 ज़मीनों की ख़रीद फरोक्त की दलाली का कार्य करता है । यह कहना गलत है की प्रत्यर्थी संख्या 1 की पुश्तेनी तीन मकानात और भी है जिस से प्रति माह लाखों रुपयों की आमदनी होती है । यह कहना गलत है प्रत्यर्थी संख्या 1 उच्च जीवन शैली का जीवन व्यापन कर रहा है । वास्तविक तथ्य यह है की प्रार्थी संख्या 1 ने प्रत्यर्थी संख्या 1 की हर जगह से नौकरी से निकाले जाने के लिए भरसक प्रयास करे है व इस कारण प्रत्यर्थी की अब तक 2 नौकरी से निकाला जा चुका है । प्रार्थी संख्या 1 नौकरी से निकलवाने के बाद भी नहीं रुकी व प्रत्यर्थी संख्या 1 का पासपोर्ट सस्पेंड करवाने के लिए कई चिट्ठियाँ पासपोर्ट केंद्र मैं भी भेज रखी है जिसकी वजह से प्रत्यर्थी संख्या 1 को नौकरी मिलने में बहुत दिक्कत हो रही है व उसको अपने परिवारजन व दोस्तों से रुपये उधार ले कर जीवन जीना पड़ रहा है । यहां यह भी उल्लेखनीय है की प्रार्थी संख्या 1 ने अपनी वकालत शादी से पूर्व ही पूर्ण कर ली थी तथा आज भी वकालत सक्रिय रूप से कर रही है । प्रार्थी संख्या 1 बतौर नोटरी भी नियुक्त है जिस से भी वह अच्छी ख़ासी रकम अर्जित कर लेती है । विधि का यह सुस्थापित सिद्धांत है कि पक्षकार को न्यायालय के समक्ष क्लीन हेण्ड से बिना कोई तथ्य छिपा ये अपना केस प्रस्तुत करना चाहिये। परिवादिया ने तथ्य छिपाकर ना कि सिर्फ न्यायालय को भ्रमित करने की कुचेष्टा करी है बल्कि शपथ पर झूंटे अभिवचन करके परजरी कारित करी है।
यह की मद संख्या 3(जेड) गलत होने से अस्वीकार है । यह कहना गलत है की आज भी प्रत्यर्थीगण स्वयं व अन्य लोगो के माध्यम से प्रार्थिया व उसके परिवारजन को धमकिया देते रहते है व प्र.सू.री. संख्या xxx/2017 वापिस लेने के लिए कहते है व प्रार्थिया व उसके पुत्र भव्य को तथा परिजनों को जान से मरवा देंगे तथा व पुत्र को स्कूल से अगवा कर लिया जायेगा ।
यह की मद संख्या 3(जेड)(क) में धारा-17 के अंतर्गत प्रार्थीगण ने जो अनुतोष किया है वह पोषनीय नहीं है । इस मद में वर्णित संपत्ति साझा ग्रहस्ती नहीं है व प्रत्यर्थी संख्या 1 की माताजी की निजी संपत्ति है । प्रार्थी संख्या 1 ने अनेको झूठे मुक़दमे प्रत्यर्थी संख्या 1 की माताजी पे कर रखे है व हर तरीके की प्रताड़ना अपनी सास पे करी है।
यह की मद संख्या 3(जेड)(ख) में धारा-18 के अंतर्गत प्रार्थीगण ने जो अनुतोष किया है वह पोषनीय नहीं है । प्रत्यर्थीगण ने परिवादिया के साथ कोई घरेलू हिंसा कारित नहीं करी है ।
यह की मद संख्या 3(जेड)(ग) में धारा-19 के अंतर्गत प्रार्थीगण ने जो अनुतोष किया है वह पोषनीय नहीं है । परिवादिया अपने माता पिता के साथ उनके स्वामित्व के आवास में रह रही है । यह संपूर्ण परिवाद में कई परस्पर विरोधाभासी कथन व अनुतोष है जिसके चलते माननीय न्यायालय को बिना विस्तृत जाँच करे बिना कोई भी अंतरिम आदेश पारित नहीं किया जा सकता है ।
यह की मद संख्या 3(जेड)(घ) में धारा-19(3) के अंतर्गत प्रार्थीगण ने जो अनुतोष किया है वह पोषनीय नहीं है । प्रत्यर्थीगण जयपुर में रहते ही नहीं है ना ही उन्होंने कभी प्रार्थिया के साथ घरेलू हिंसा कारित करी ना ही आगे करने वाले है । यह अनुतोष बेबुनियाद व काल्पनिक तथ्यों पे माँगा गया है जो प्रदान किया जाने योग्य ही नहीं है ।
यह की मद संख्या 3(जेड)(ड) में धारा-20 के अंतर्गत प्रार्थीगण ने जो अनुतोष किया है वह पोषनीय नहीं है । प्रार्थी स्वेछा व बिना किसी कारण प्रत्यर्थीगण का त्याग कर अलग रह रही है व उसने प्रत्यर्थी की हर जगह से नौकरी छुड़वा दी है इसलिए वह किसी भरण-पोषण की अधिकारी नहीं है । यही नहीं प्रत्यर्थीगण का समाज में नाम खराब करने के लिए देहरादून के आस पड़ोस के लोगो के नाम से भी उलटी सीढ़ी चिठिया पुलिस में लिखी है व प्रत्यर्थिगण पर क्रूरता कारित करी है । यही नहीं प्रार्थी संख्या 1 ने प्रत्यर्थी संख्या 1 का पासपोर्ट भी रद्द करने का प्रार्थना पत्र पासपोर्ट ऑफ़िस को दिया व इसी याचिका में माननीय न्यायालय से भी पासपोर्ट जप्त करने का अनुतोश किया जिस से यह सिद्ध है की प्रार्थी संख्या 1 चाहती ही नहीं की प्रत्यर्थी संख्या 1 कहीं भी काम कर पाए । माननीय उच्च न्यायालय ने फ़ैसलों में यह मिसाल पारित करी है की जो महिला अपने पति के कार्य स्थल पे उसकी शिकायत कर उसकी नौकरी छुड़ा देती है वह किसी भी किस्म के भरण-पोषण की अधिकारिणी नहीं है ।
यह की मद संख्या 3(जेड)(च) में धारा-21 के अंतर्गत प्रार्थीगण ने जो अनुतोष किया है वह पोषनीय नहीं है । प्रत्यर्थीगण को प्रार्थी संख्या 2 से पिछले 2 साल से प्रार्थी संख्या 1 ने मिलने नहीं दिया है, ना ही फ़ोन या वीडियो कॉल या किसी और ज़रिया प्रत्यर्थीगण से संपर्क होने दिया है । प्रार्थी संख्या 1 अपने अहंकार में इतनी चूर है कि अपनी खुद की संतान के हित को दरकिनार कर दिया है व प्रार्थी संख्या 2 को अपने पिता व दादी के प्यार से वंचित कर अपने पुत्र प्रार्थी संख्या 2 पे भी भारी क्रूरता कारित कर रही है जिस से बच्चे को भविष्य में कई भावनात्मक समस्याओं का सामना कर पड़ सकता है । माननीय न्यायालय को बच्चे की हित को ध्यान में रखते हुए यह अनुतोष नहीं प्रदान करना चाहिए व प्रार्थी संख्या 2 की साझा संरक्षण के आदेश देने चाहिए ताकि नाबालिक पुत्र प्रार्थी संख्या 2 को माता व पिता दोनों का प्रेम व स्नेह प्राप्त हो सके ।
यह की मद संख्या 3(जेड)(छ) में धारा-22 के अंतर्गत प्रार्थीगण ने जो अनुतोष किया है वह पोषनीय नहीं है । प्रत्यर्थीगण ने कोई मानसिक यातना और भावनात्मक कष्ट प्रार्थीगन को नहीं दिए व हमेशा ही स्नेह व प्रेम से अपने साथ रखा । जब परिवादिया, प्रत्यर्थीगण का परित्याग कर अलग रह रही थे तब भी प्रत्यर्थीगण प्रेम से पेश आये व वैवाहिक जीवन को बचाने हेतु प्रार्थी संख्या 1 की कई नाजायज मांगो की भी पूर्ति करी । इसके प्रतिकूल प्रत्यर्थीगण पे अनेकों झूठे इल्जाम लगा के व प्रार्थी संख्या 2 को पिता व पिता के परिवारजन से ना मिलने देने से प्रार्थी संख्या 1 ने प्रत्यर्थीगण को मानसिक यातना और भावनात्मक कष्ट दिए है ।
अतिरिक्त कथन
यह की शादी के पश्चात प्रत्यर्थी संख्या 1 व प्रार्थी संख्या 1 का वैवाहिक जीवन सहज ही चल रहा था व आपस में दोनों के प्रेम पूर्वक सम्बन्ध थे । दिनांक 02/06/2011 को अकस्मात् ही प्रार्थी संख्या 1 की एक सड़क दुर्घटना हो गयी । जब यह दुर्घटना हुई तब प्रार्थी संख्या 1 ड्राइवर थी व प्रत्यर्थी संख्या 1 की bhabhi श्रीमती व उनकी पुत्री सवार थी । इस सड़क दुर्घटना में प्रार्थी संख्या 1 को गंभीर चोटें सर व बाँह पे आई व इन चोटों का इलाज़ भी अस्पताल में किया गया । इलाज़ दौरान प्रार्थी संख्या 1 के चेहरे पे लगी चोटों का भी इलाज़ किया गया वह उसके हाथ के चोट होने से प्लास्टर लगाया गया ।
यह की 2016 में प्रार्थी संख्या 1 RJS की तैयारी का हवाला दे कर जयपुर आ कर रहने लगी । इस दौरान प्रार्थी संख्या 1 ने लगभग 4,10,000/- रुपये प्रत्यर्थी संख्या 1 के बैंक के ATM कार्ड से निकाल लिए व कई बार बैंक का बैलेंस शून्य कर प्रत्यर्थी संख्या 1 को आर्थिक समस्या में डाल दिया । यही नहीं प्रार्थी संख्या 1 व उसके माता पिता ने प्रत्यर्थी संख्या 1 पे दबाव बनाना शुरू कर दिया की वह जयपुर में घर जमाई बन कर रहे और हर महीने अपनी तनख़्वाह की 50 प्रतिशत रकम प्रार्थी को दे वे नहीं तो प्रार्थी संख्या 1 प्रत्यर्थीगण के खिलाफ कई मुक़दमे कर देगी । जब प्रत्यर्थीगण यह मांग नहीं पूरी कर पाए तो प्रार्थी संख्या 1 ने महिला हेल्प लाइन पे कंप्लेंट भी दर्ज करी व बाद में खुद ही बंद भी करवा दी । यही नहीं प्रत्यर्थीगण का देहरादून में समाज में नाम खराब करने के लिए आस पड़ोस के लोगो के नाम से कई कोम्प्लैंट्स देहरादून पुलिस को भी भेजी जिसकी तहकीकात करने जब पुलिस आयी तो सभी आस पड़ोस के लोगो को बहुत आश्चर्य हुआ क्योंकि उन्होंने ऐसी कोई शिकायत नहीं लिखी थी । यह सभी कार्य करके प्रार्थी संख्या 1 ने प्रत्यर्थीगण पे भारी क्रूरता कारित करी है व किसी भी रूप में भरण-पोषण की अधिकारीनी नहीं है ।
यह की प्रार्थी संख्या 1 प्रत्यर्थी को नौकरी से अब तक 2 बार निकलवा चुकी है । वह बार बार झूठी व बेबुनियाद कम्प्लैंट्स प्रत्यर्थी संख्या 1 के दफ्तर भेजती रहती है जिस से प्रत्यार्थी संख्या 1 को दफ्तर में बेहद शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा व इस कारण उसकी नौकरी भी छूट गयी । यही नहीं प्रार्थी संख्या 1 ने अनेक कम्प्लैंट्स सरकारी दफ्तरों में भी कर रखी है व प्रत्यर्थी संख्या 1 का पासपोर्ट जप्त करने की कोशिश कर रही है ताकि प्रत्यर्थी संख्या 1 किसी काम के लिए हिंदुस्तान से बाहर ना जा पाए । ऐसा ही अनुतोष प्रार्थी संख्या 1 ने इस प्रकरण में भी माननीय न्यायालय से भी कर रखा है जो की सरासर बेबुनियाद व हास्य पद है । यह सभी अवैध कार्य करके प्रार्थी संख्या 1 ने प्रत्यर्थीगण के पे भारी क्रूरता कारित करी है व किसी भी रूप में भरण-पोषण की अधिकारी नहीं है ।
यह की प्रार्थी संख्या 1 द्वारा करी गयी शिकायतों की वजह से अपनी पिछली नौकरी से भी निकाला जा चुका है व वर्तमान में एक नौकरी ढूंढने की संपूर्ण कोशिश कर रहा है परन्तु प्रथ्यार्थी संख्या 1 जहाँ भी नौकरी के लिए प्रार्थना-पत्र पेश करता है वह कंपनी उसका बैकग्राउंड चेक करने के लिए पिछली कंपनी से पूछते है जो यह बता देती है की प्रत्यर्थी संख्या 1 को उसकी पत्नी द्वारा दी गयी कम्प्लैंट्स की वजह से निकाला गया था और इसी कारण प्रत्यर्थी संख्या 1 को नौकरी मिलने में बहुत दिक्कत आ रही है । प्रत्यर्थी संख्या 1 वर्तमान में आय विहीन व्यक्ति है व दोस्तों व रिश्तदारो से उधार लेकर किसी तरह अपना जीवन व्यापन कर रहा है ।
यह कि उपरोक्त वृतांत से यह स्पष्ट है कि प्रार्थिया मुक्दमें पे मुक्दमें प्रत्यर्थीगण के विरूद्ध न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग करके लगा ये चली जा रही है एवं परिवादिया का एक मात्र उद्धेष्य प्रथ्यार्थीगण को ब्लैकमेल करना है व मोटी राशि एठना है । यह कि प्रार्थी संख्या 1 ने अपने परिवाद में प्रत्यर्थीगण के विरूद्ध संरक्षण आदेश पारित किये जाने की मांग करी है जो कि पूर्णतः निराधार है एवं उपरोक्त वर्णित तथ्यों व परिस्थितियों के विपरीत है। वास्तविक तथ्य यह है की प्रत्यर्थीगण परिवादिया के आक्रामक रवैये से आतंक मय जीवन व्यतीत कर रहे हैं व प्रत्यार्थी संख्या 1 को नौकरी मिलने में बहुत मुश्किल हो रही है । यह की प्रार्थी संख्या 1 ने अपने परिवाद में धारा 17, 18, 19, 19(3), 20, 21 व 22 के अंतर्गत जो अनुतोष किये है वह पोषनीय नहीं है । प्रार्थी संख्या 1 ने खुद बिना किसी कारण प्रत्यार्थिगण का परित्याग कर अलग रह रही है व उसने अनेक झूठे आरोप प्रत्यर्थीगण पे लगा कर अपर क्रूरता प्रत्यर्थीगण पे करी है व प्रार्थी संख्या 2 को पिता, दादी व अन्य परिवारजनों से न मिलने ना बात-चीत करने देने की वजह से प्रार्थी संख्या 2 पे भी अपर क्रूरता कारित कर रही है । ऐसे में कोई भी अनुतोष प्रार्थी संख्या 1 के हक़ में देना न्यायोचित नहीं है ।
यह कि परिवादिया ने प्रत्यर्थी संख्या 2 श्रीमति xxx को भी हस्तगत प्रकरण में रेस्पोंडेंट बना दिया है, जबकि घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 2 (क्यू) के अनुसार महिला को रेस्पोंडेंट पक्षकार नहीं बनाया जा सकता। यह कि हस्तगत प्रकरण में संरक्षण अधिकारी की रिपोर्ट भी नहीं आयी है। ऐसी परिस्थितियों में यह परिवाद पोषणीय नहीं है।
यह की प्रत्यर्थी संख्या 1 ने धारा 91 Cr. P. C. तहत एक एप्लीकेशन न्यायालय समक्ष पेश किया है उस पर जो भी आदेश होता है उसके अनुऊरोप इस जवाब मैं संशोधन की स्वतंत्रता को रिजर्व रखा जावे। यह की परिवादिया का यह परिवाद प्रा.सू.री. संख्या 264/2017 की हुबहू नकल है जिसमे पुलिस द्वारा अनेक आरोप झूठे व असत्य पाए गये है । अतः यह केस भी खारिज होने योग्य है। एक ही आरोपों के सेट पर परिवादिया कितनी बार तफ्तीश चाहती है।
यह की प्रार्थी संख्या 1 ने अपने शैक्षिक योग्यता को छुपाते हुए व रजिस्टर्ड नोटरी होने के तथ्य को छिपा कर स्वयं को आयहीन व्यक्ति बता कर प्रकरण unclean hands से पेश किया है इसलिए भी यह परिवाद सिरे से ख़ारिज किये जाने योग्य है ।
यह की परिवादिया ने कपोल कल्पित आधारों पे प्रत्यर्थी के ख़िलाफ़ परिवाद में व एफ॰आई॰आर में कथन किए हैं जो सरासर झूट है । प्रत्यर्थी ने परिवादिया को बहुत स्नेह व सम्मान से अपने साथ रखा उसके साथ सुखमय समय व्यतीत किया । प्रत्यर्थी ने परिवादिया की महत्वाकांक्षा को पूरा करने में सहयोग दिया । परिवादिया ने प्रत्यर्थी को झूटे मुक़द्दमों में फँसा दिया । परिवादिया के साथ इस मुक़द्दमेबाज़ी में प्रत्यर्थी बर्बाद हो गया । प्रत्यर्थी की बहुत अच्छी नौकरी मर्चेंट नेवी की थी प्रत्यर्थी मर्चेंट नेवी में संविदाकर्मी था प्रत्यर्थी को अच्छी आय प्राप्त होती थी । परिवादिया द्वारा दायर करी गयी शिकायतों की वजह से प्रत्यर्थी की ये नौकरी अगस्त 2016 में छूट गयी उसके बाद से प्रत्यर्थी परिवादिया के द्वारा संयोजित मिथ्या विवादों में उलझ गया । प्रत्यर्थी को bulmen realty में नौकरी मिली थी । इस नौकरी में प्रत्यर्थी को रुपए 30000 मासिक प्राप्त होता । किंतु परिवादिया ने प्रत्यर्थी संख्या 1 की शिकायत कर दी तो प्रत्यर्थी के एम्प्लॉअर द्वारा प्रत्यर्थी को नौकरी से निकाल दिया । परिवादिया हर जगह प्रत्यर्थी की शिकायतें करती रहती है । इसके अलावा परिवादिया ने प्रत्यर्थी पर अन्य क्रूरता भी कारित करी है जिसे प्रत्यर्थी सक्षम न्यायालय में सुसंगत कार्यवाही में प्रस्तुत करने के अपने विधिक अधिकार को सुरक्षित रखता है । यह की परिवादिया एक पढ़ी लिखी महिला है । परिवादिया पिछले 11 सालों से बतौर अधिवक्ता कार्य कर रही है । परिवादिया बतोर नोटरी व अधिवक्ता काम करती है व महीने के 1 लाख रुपये आय अर्जित करती है । परिवादिया को बतोर नोटरी व अधिवक्ता के कार्य करने के प्रमाणस्वरुप निम्न दस्तावेजात प्रत्यर्थी ने पूर्व में प्रस्तुत किये है जो की निम्न प्रकार है :
RTI द्वारा प्राप्त की गयी परिवादिया की शिक्षा सम्बंधित दस्तावेज व अभिभाषक संघ सुजानगढ़ जिला चुरू राजस्थान द्वारा दिया गया कार्य अनुभव प्रमाण पत्र जो की यह दर्शाता है की 2008 से 2011 तक परिवादिय नियमित रूप से बतोर अधिव्यकता कार्यरत रही ।
इनकम टैक्स से RTI द्वारा प्राप्त जवाब जिस से यह स्पष्ट है की परिवादिया का PAN नंबर AJXPJ8144J है व परिवादिया हर साल ITO, Ward 1(4), बीकानेर में इनकम टैक्स भरती है ।
राजस्थान की बार काउंसिल की 2018 की मतदाता सूची के उचित प्रष्ट जिनपे परिवादिया का रजिस्ट्रेशन नंबर स्पष्ट है ।
Department of Legal Affairs (legalaffairs.gov.in) की वेबसाइट से डाउनलोड किया परिवादिया का नोटरी के रूप में नियुक्ति के लिए उम्मीदवारों का चयन के लिए न्योता जो की एक सार्वजनिक रूप से उपलब्ध दस्तावेज है व संदेह से परे है ।
Department of Legal Affairs (legalaffairs.gov.in) की वेबसाइट से डाउनलोड किया गया सार्वजनिक दस्तावेज़ जिस में परिवादिया का बतोर नोटरी नियुक्त होना वर्णित है ।
परिवादिया के PAN कार्ड की कॉपी ।
परिवादिया द्वारा हाल ही में ज़ारी किया गया 1 लीगल नोटिस जो परिवादिया ने बतोर अधिवक्ता अपने क्लाइंट के लिए भेजे है जो यह दर्शाता है की वह बतोर अधिवक्ता भी काम कर रही है, जबकि वह Department of Legal Affairs द्वारा नोटरी नियुक्त हो चुकी है ।
अतः जवाब परिवाद प्रस्तुत कर निवेदन है कि परिवाद विरूद्ध प्रत्यर्थीगण मय हर्जे खर्चे खारिज फरमाया जाये व परिवादिया को पाबंद फ़रमाया जावे की वो प्रत्यर्थी के जीवन में हस्त्क्शेप नहीं करे और प्रत्यर्थी कहीं भी नौकरी करे उसकी मिथ्या शिकायतें करके उसे नौकरी से नहीं निकलवाए और परिवादिया प्रत्यर्थी की बदनामी नहीं करे । प्रार्थी संख्या 1 को आदेश दिया जाए की वह प्रार्थी संख्या 2 को प्रत्यर्थीगण से मिलने व बातचीत करने में कोई बाधा ना उत्पन्न करे व प्रार्थी संख्या 1 को निर्देशित किया जावे की वह भविष्य में प्रत्यर्थी संख्या 1 के किसी भी कार्य स्थल पे किसी किस्म की शिकायत ना करे व ऐसा कोई कार्य ना करे जिससे प्रत्यर्थी संख्या 1 को नौकरी से निकाला जाये । अन्य कोई अनुतोष जो प्रत्यर्थी के हक में हो अदा फरमाया जाये।
प्रत्यर्थी संख्या 1 Xxx
जरिये अधिवक्ता
(Xxx) जयपुर दिनांक:
समक्ष अपर मुख्य महानगर मजिस्ट्रेट क्रम संख्या – ______ जयपुर महानगर, जयपुर । प्रकरण संख्या: ____ / 20____ Xxx xxx बनाम xxx xxx जवाब प्रार्थना पत्र के समर्थन में शपथ पत्र मैं, xxx xxx, पुत्र स्वर्गीय श्री xxx xxx, उम्र xx वर्ष जाति बम्मी, (पंजाबी), हाल पता: निवासी किराएदार फ्लैट नंबर address, जिला गौतम बुद्ध नगर, उत्तर प्रदेश सशपथ निम्न कथन करता हूँ:- यह की संलग्न जवाब प्रार्थना पत्र में मैं प्रत्यर्थी संख्या 1 हूँ व प्रकरण के तथ्यों व परिस्थितियों से भलीभाँति परिचित हूँ। यह की संलग्न जवाब प्रार्थना पत्र की मद सम्पूर्ण मेरी निजी ज्ञान व जानकारी में सही व सत्य है कोई तत्विक तथ्य नहीं छिपाया है । यह की संलग्न जवाब प्रार्थना पत्र मेरे अधिवक्ता द्वारा मेरे निर्देशों व मार्गदर्शन में तैयार करवाया है जिसमें लिखी इबारत मैंने सरल शब्दों में पढ़ सुनकर समझ ली है । यह की इस शपथ पत्र को प्रार्थना पत्र का अभिन्न अंग माना जावे ।
शपथग्रहिता सत्यापन मैं उपरोक्त शपथग्रहिता सत्यापित करता हूँ की मेरे उपरोक्त शपथपत्र के मद संख्या 1 लगायत 4 मेरे निजी ज्ञान व जानकारी में सही व सत्य है कोई तत्विक तथ्य नहीं छिपाया है । ईश्वर मेरा साक्षी है ।
सत्यापनकर्ता


